महात्मा गांधी के आर्थिक विचार

भूपेंद्र सिंह

गांधीजी के विचारों को शब्दों में बांधना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।महात्मा गांधी के विचारों की सरलता और गहराइयों को समझने के लिए शब्दों का अभाव हो सकता है। भूमंडलीकरण के इस दौर में शहरों की चकाचौंध बढ़ती जा रही है, वहीं गाँवों की सादगी धूमिल होती प्रतीत हो रही है। गांधीजी के विचार हमें दोबारा वहीं गांव की गलियों की सादगी और स्वच्छता में ले जाते हैं जहां गोधूलि बेला का आनंद मिलता है, जिसका अभाव आज की भागदौड़ वाली दुनिया में खलता है।

महात्मा गांधी गाँवों को एक राष्ट्र में उत्पादन की सबसे छोटी इकाई के रूप में देखते थे। चूंकि महात्मा गांधी एक आध्यात्मिक पुरुष थे तो उन्होंने अध्यात्म में जिस गांव की संरचना देखी थी वह रामराज्य से प्रेरित थी।इसमें गाँवों को लोकतांत्रिक रूप से चलाया जाता था, जहां शासक लोगों के हित के लिए काम करता था। सभी को समान अवसर प्रदान किए जाते थे, हिंसा की कोई जगह नहीं थी और जहाँ सभी धर्म और मान्यताओं का आदर किया जाता था। परंतु गांधीजी के इस विचारधारा को एक राष्ट्रवादी हिंदू मानसिकता से जोड़ना ठीक नहीं होगा क्योंकि गांधीजी साथ ही साथ यह भी कहते थे कि “मैं उस राम में आस्था नहीं रखता हूं जो रामायण में है, मैं उस राम में आस्था रखता हूं जो मेरे मन में है।”

महात्मा गांधी जिस भारत की कल्पना करते थे उस भारत में पंचायतों को स्वावलंबी बनाने पर जोर दिया गया था। गांधीजी का मानना था कि भारत कुछ चंद शहरों में नहीं बल्कि अपने 7 लाख गाँवों में बसता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता निचले स्तर से आरंभ होनी चाहिए। 19वीं शताब्दी के ढेरों विद्वानों के लेखों में गाँवों को सुचारु रूप से चलाने की बात कही गयी है। गांधीजी ने उन्हीं विचारों को पुनर्जीवित कर भारत के लोगों के समक्ष रखा था। बापू ने नए सिद्धांतों का आविष्कार नहीं किया था, उन्होंने भारत की महान सभ्यता से बस पुनः अवगत कराया था।

भूमंडलीकरण के इस दौर में मानव के रहन सहन में बदलाव आया है। आज के माहौल में गांधी जी के विचार खोते जा रहे हैं और उनकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। गांधीजी का कहना था कि “अर्थ पक्ष और नैतिक पक्ष एक दूसरे के पूरक है, अर्थात आर्थिक प्रतिस्पर्धा में हमें अपनी नैतिकता को भूलना नहीं चाहिए क्योंकि प्रकृति के नियम पूर्ण सत्य हैं, परंतु आर्थिक नियम समय व स्थान के साथ बदलते रहते हैं।”

गांधीजी का मानना था कि भारत की सभी समस्याओं का समाधान ‘अहिंसा’ में छिपा है। गांधीजी पूंजीवाद के विरोधी थे। उनका कहना था कि “इस पृथ्वी पर मानव की आवश्यकता अनुसार प्रचुर मात्रा में संसाधन उपलब्ध है, परंतु मानव की लालसा के अनुरूप संसाधन नहीं हैं”। अगर मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं का उपयोग करें तो कोई भी इस दुनिया में भूखा नहीं मरेगा। गांधी जी उन सभी अहिंसक आजीविकाओं के समर्थन में थे जो घृणा और शोषण के विरुद्ध थे।

गांधीजी विकेंद्रीकृत उद्योगों के पक्षधर थे। उनका मानना था कि औद्योगीकरण समस्त सामाजिक राक्षसों की जननी है। गांधीजी ने विकेंद्रीकृत उद्योगों का समर्थन किया क्योंकि उनका मानना था कि विकेंद्रीकृत उद्योगों में शोषण ना के बराबर होगा। चूँकि भारत एक श्रमिक प्रधान देश है और उस वक़्त पूंजी का अभाव था तो ऐसे में श्रम धनिक तकनीक का इस्तेमाल होना चाहिए। ये सिद्धांत आज के समय में प्रासंगिक नहीं लगते हैं परंतु यह उस समय की बात है जब भारत में बेरोजगारी तथा भुखमरी बहुत बड़े स्तर पर थी। उस वक़्त की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों को सप्ताह में एक बार उपवास करने की सलाह दी जाती थी ताकि सभी लोगों को भोजन उपलब्ध हो सके।

इसके साथ ही भारत में बेरोजगारी को देखते हुए उन्होंने खादी ग्राम उद्योग को बढ़ावा देने की बात भी कही। गांधीजी का कहना था कि “खादी एक वस्त्र नहीं, खादी एक विचार है”। गांधी जी खादी को भारत की आर्थिक स्वतंत्रता तथा एकता का प्रतीक मानते थे। गांधीजी का खादी उद्योग को बढ़ावा देने के पीछे तर्क था कि खादी उद्योग भारत के सभी लोगों को रोजगार दिला सकता है तथा भारत को आर्थिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र बना सकता है। इसीलिए गांधी जी ने चरखा को एक उपकरण के रूप में चुना जो सस्ता, कम पूंजी पर चलने वाला तथा सभी घरों में आसानी से इस्तेमाल हो सकता था। उत्पादन के किसी औजार का ऐसा समाजवादी तसव्‍वुर, किसी नेता नहीं किया जैसा गांधी जी ने चरखा का किया है। गांधी जी चरखे के जरिए हर तरह के विभेद को खत्म करने की बात करते हैं। वे एक जगह लिखते हैं“काम ऐसा होना चाहिए जिसे अपढ़ और पढ़े-लिखे,  भले और बुरे, बालक और बूढ़े, स्त्री और पुरुष, लड़के और लड़कियां, कमज़ोर और ताकतवर- फिर वे किसी जाति और धर्म के हों- कर सके। चरखा ही एक ऐसी वस्तु है, जिसमें ये सब गुण हैं। इसलिए जो कोई स्त्री या पुरुष रोज़ आधा घंटा चरखा कातता है, वह जन समाज की भरसक अच्छी से अच्छी सेवा करता है।” साथ ही साथ  उन्होंने ‘कताई से स्वराज’ का नारा भी दिया। गांधीजी का मकसद भारत के हर एक घर को उत्पादन की एक इकाई में बदलना था। इससे भारत एक आत्मनिर्भर राष्ट्र के साथ-साथ पूरी दुनिया का एक विनिर्माण केंद्र बन सकता था। गांधीजी मशीन को एक ‘उच्चतम कोटि के पाप’ के रूप में देखते थे। गांधी जी का मानना था कि बड़े स्तर पर मशीनों का उपयोग भारत में बेरोजगारी का मुख्य कारण होगा और साथ ही साथ इससे समाज में अस्थिरता पैदा होगी,  जो हम आज के वातावरण में देख भी सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इन सभी विचारों को इस समय की परिस्थितियों के मद्देनजर रखते हुए समझने की कोशिश की जाए।

गांधीजी भारत की आर्थिक स्वतंत्रता को निचले स्तर से शुरू करना चाहते थे, इसके लिए गांधीजी ने ‘ग्राम सर्वोदय’ का नारा भी दिया ताकि गांव अपना उद्धार खुद कर सके तथा ‘सर्वोदय- सभी के उदय’ की अवधारणा प्रस्तुत हो। भारत के संविधान में ग्राम पंचायतों का गठन इसी विचारधारा से  प्रेरित है।

गांधीजी के विचार पूरे विश्व की सभी अन्याय विरोधी लड़ाइयों का नेतृत्व करते दिखाई पड़ते हैं। चाहे वह मिस्र का मेडिसन स्क्वायर हो, पोलैंड की एकजुटता की लड़ाई हो, सोवियत संघ में टैंकों को गुलाब का फूल देना हो, मार्टिन लूथर किंग की रंगभेद के खिलाफ की लड़ाई हो तथा हाल ही में ईरान में सोशल साइट्स की पाबंदी की लड़ाई हो। जब कभी भी आप अपने आप को अन्याय से घिरा पाए और आप सही हों तो गांधीजी के विचार आपके जीवन में एक हथियार की तरह काम आएंगे।

गांधीजी के आर्थिक विचारों में मानवता सर्वोपरि स्थान ग्रहण करती है।सकल घरेलू उत्पाद तथा विकास संबंधी अन्य सुचिकांक तभी तक मायने रखते हैं जब तक उनसे जन-कल्याण का लक्ष्य पूरा हो सके। गांधी जी एक राष्ट्र, एक युवा, एक नागरिक, एक किसान, एक छात्र को शून्यता की वरीयता से अवगत कराते हैं जिसका एकमात्र उद्देश्य मानवता की सभी परम सीमाओं को लांघकर एक आदर्श राष्ट्र का निर्माण करना है।

References:

1)  India unbound by gurcharan das

2) http://www.economicsdiscussion.net/articles/economic-ideas-of-mahatma-gandhi/21133

3) https://www.youthkiawaaz.com/2017/01/mahatma-gandhi-and-his-charkha-philosophy/

 

 

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