वित्तीय वर्ष की तारीखों में बदलाव

द्वारा सत्यम कुमार

भारत में किसानों की भलाई के नाम पर हर वर्ष सरकारें कई बदलाव करतीं हैं। कुछ नई योजनाओं का उद्घाटन किया जाता है तो वहीं कुछ पुरानी योजनाओं को गैर जरूरी बताकर उन्हें बंद कर दिया जाता है। इन बदलावों का किसानों के जीवन पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ता है यह तो शोध का विषय है। पिछले कुछ महीनों से किसानों की भलाई के लिए सरकार एक और परिवर्तन करने के लिए उत्सुक दिख रही है। भारत सरकार वित्तीय वर्ष की तारीखों को बदलना चाहती है। सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस विषय पर देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य की अगुवाई में एक कमेटी का भी गठन किया गया, इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। फिलहाल इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन मीडिया के गलियारे में बड़े जोरों से यह चर्चा है कि इस कमेटी ने वित्त वर्ष में बदलाव की सिफारिश की है। हालांकि सी०एन०बी०सी को दिए गए एक इंटरव्यू में शंकर आचार्य जी ने बड़े ही स्पष्ट तौर पर यह कहा है कि उनकी जानकारी के अनुसार रिपोर्ट में ऐसी कोई भी बात नहीं है जो वित्तीय वर्ष में बदलाव की ओर इशारा करती है। इसके अलावा देश के माननीय प्रधानमंत्री भी अलग-अलग मौकों पर वित्त वर्ष की तारीखों में बदलाव का जिक्र कर चुके हैं। भाजपा शासित दो राज्यों – मध्य प्रदेश और झारखंड, में तो यह बदलाव लागू भी कर दिया गया है। इन दोनों राज्यों में वित्तीय वर्ष की गणना अब 1जनवरी से की जाएगी। होगा। भारतीय किसान के जीवन में सिर्फ तारीखें ही बदलती हैं, दिन पता नहीं कब बदलेंगे!

वित्त वर्ष के कैलेंडर को बदलने के विषय पर अर्थशास्त्री और नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय और किशोर देसाई ने एक चर्चा पत्र भी लिखा है। 52 पन्नों के इस चर्चा पत्र में कई तर्कों का उल्लेख है। यह बताया गया है कि वर्तमान वित्त वर्ष ना तो मानसून से जुड़ता है, ना कृषि से और ना भारतीय संस्कृति से। इसके अलावा यह भी बताया गया है की दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ कदम मिलाने के लिए जरूरी है कि हम भी उन्हीं की तरह जनवरी से दिसंबर तक के वित्त वर्ष की परंपरा अपना लें। आने वाले दिनों में अगर ऐसा कोई भी बदलाव किया जाता है तो यह निश्चित तौर पर ऐतिहासिक होगा।

वित्तीय वर्ष है क्या? विश्व के विभिन्न देशों में वित्तीय वर्ष की अवधि क्या है? क्या हमें सच में वित्तीय वर्ष में संशोधन करने की ज़रूरत है? भारत में वित्त वर्ष का इतिहास क्या रहा है? क्या पहले भी वित्तीय वर्ष में बदलाव करने की कोशिश की गई है? इन प्रयासों का परिणाम क्या रहा? वित्तीय वर्ष की तारीखों में बदलाव करने से क्या फायदे हैं? इस परिवर्तन के कारण कौन सी समस्याएं उत्पन्न हो सकतीं हैं? यह बदलाव सिर्फ बदलाव करने के उद्देश्य से तो नहीं किया जा रहा? अगर कोई परिवर्तन किया जाता है तो नई व्यवस्था का प्रारूप कैसा होगा?

यह लेख इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास करता है।

वित्तीय वर्ष की अवधारणा की शुरुआत सम्भवतः सरकारों द्वारा सालाना बजट प्रस्तुत करने के अभ्यास से शुरू हुई। एक वित्तीय वर्ष आमतौर पर 1 वर्ष की अवधि का होता है, जो किसी चुनी हुई तारीख से शुरू होकर 12 महीने बाद समाप्त होता है। इसका उपयोग सरकार की आर्थिक स्थिति के आकलन के लिए किया जाता है।

संविधान के अनुच्छेद- 112, 202 और 367 (1) में केंद्र और राज्यों के लिए वित्तीय वर्ष और बजट से संबंधित प्रावधानों का जिक्र है। अनुच्छेद-112 कहता है, ‘  राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में संसद‌ के दोनों सदनों के समक्ष भारत सरकार की उस वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग में ”वार्षिक वित्तीय विवरण” कहा गया है।’ इसी तरह अनुच्छेद-202 के मुताबिक, ‘राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में राज्य के विधान-मंडल के सदन या सदनों के समक्ष उस राज्य की उस वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाएगा जिसे इस भाग ” वार्षिक वित्तीय विवरण”  कहा गया है।’ यानी दोनों अनुच्छेदों में वित्त वर्ष का जिक्र तो है, लेकिन वह कब से शुरू होगा इसका उल्लेख नहीं है। लेकिन अनुच्छेद-367 (1) में वित्तीय वर्ष से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या के लिए साधारण खंड अधिनियम-1897(जनरल क्लॉज एक्ट) का संदर्भ दिया गया है। इस कानून के खंड-3 के मुताबिक, ‘वित्तीय वर्ष की परिभाषा का अर्थ ये है कि वह साल जो अप्रैल के पहले दिन से शुरू होता हो’।

इतिहास

भारत में वर्तमान वित्तीय वर्ष (1अप्रैल-31मार्च) 1867 ई० में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया। इसके पहले (1860 ई०-1866 ई०) वित्तीय वर्ष की अवधि 1 मई से लेकर अगले वर्ष के 30 अप्रैल तक होती थी। सन 1867 ई० में ब्रिटिश सरकार से तालमेल बनाने के उद्देश्य से भारत के वित्तीय वर्ष में भी बदलाव कर दिया गया। पिछले 150 वर्षों में इस प्रथा की उपयुक्तता पर कई बार सवाल उठाये जा चुके हैं।

अंग्रेजों ने इस बदलाव से पहले इंग्लैंड के दो अधिकारियों- फॉस्टर और विफिन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। उन्होंने सुझाया था कि भारतीय वित्तीय वर्ष यहां के मौसम-मानसून आदि के आधार पर एक जनवरी से शुरू करना बेहतर होगा। लेकिन इस सुझाव को नहीं माना गया क्योंकि ब्रिटेन में वित्तीय वर्ष एक अप्रैल से शुरू होता था। ब्रिटिश शासन ने सन 1897 ई० में जनरल क्लॉज एक्ट पारित कर इस व्यवस्था के स्थायित्व का बंदोबस्त भी कर दिया।

हालांकि इसके बाद भी बदलाव के सुझाव आते रहे। मसलन 1900 ई० में वेल्बी आयोग ने इस पर विचार किया और फिर 1908 ई० में दरभंगा के महाराज के सुझावों के आधार पर भारत सरकार ने भी।

कुछ समय बाद ही 1913 ई० में बने रॉयल कमीशन ऑन इंडियन फायनेंस एंड करेंसी (चैम्बरलेन आयोग) ने भी इस मुद्दे की पड़ताल की। उसने भी 1914 ई० में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में भारतीय वित्तीय वर्ष को एक नवंबर या एक जनवरी से शुरू करने की वकालत की।

फिर 1921 ई० में पहले विश्व युद्ध के बाद सर दिनशॉ वाचा के सुझावों के आधार  पर  भारत सरकार ने  वित्तीय वर्ष 1जनवरी से शुरू करने  पर विचार किया। लेकिन कभी प्रांतीय सरकारों के विरोध की वजह से तो कभी किन्हीं और कारणों से सरकार इस मसले पर पीछे हटती रही।

आजादी के बाद पश्चिम बंगाल के कल्याणी में हुए कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान भी एक गैर आधिकारिक संकल्प पारित किया गया। इसमें सरकार से मांग की गई कि भारतीय वित्त वर्ष बदलकर एक जुलाई से कर दिया जाए। लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने यह मांग खारिज कर दी। फिर 1956 ई० में राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठक में यह मसला उठा, मगर सर्वसम्मति नहीं बन पाई। फिर 1958 ई० में दूसरी लोकसभा की आकलन समिति (एस्टिमेट कमेटी) की 20वीं रिपोर्ट में सुझाया गया कि देश का वित्तीय वर्ष एक अक्टूबर से शुरू किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार को लगा कि यह वक्त इस तरह के बदलाव के लिए उचित नहीं है।

1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी) के अध्ययन दल ने देश के वित्तीय प्रबंधन के बारे में अपनी रिपोर्ट दी। इसमें कहा गया कि एक अप्रैल से वित्तीय वर्ष शुरू होने वाली व्यवस्था बदलने पर विचार किया जा सकता है। इसके विकल्प के तौर पर एक अक्टूबर से वित्त वर्ष शुरू करना ज्यादा मुफीद होगा। हालांकि जनवरी 1968 ई० में वित्त, लेखा एवं परीक्षण पर चौथी रिपोर्ट जब सरकार को दी गई तो आयोग के अध्यक्ष के० हनुमंथैया ने वित्त वर्ष संबंधी सिफारिश में बदलाव कर उसे एक नवंबर कर दिया। उन्होंने तर्क दिया, ‘भारतीय वित्तीय वर्ष अगर दीवाली के आसपास शुरू होता है कि यह देश की संस्कृति और परंपरा के अनुरूप होगा।’

केंद्र सरकार ने एआरसी की सिफारिशों को एनडीसी की बैठक में विचार के लिए रखा। लेकिन तमाम पहलुओं पर विचार के बाद एनडीसी ने यह सिफारिश मंजूर नहीं की। एनडीसी की बैठक में 1981ई० में भी यह मसला विचार के लिए आया। इसके बाद 1983ई० में केंद्रीय वित्त मंत्री ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस संबंध में सुझाव मांगे कि क्या देश का वित्त वर्ष बदला जाना चाहिए? उस वक्त करीब-करीब सभी मुख्यमंत्रियों ने इस पर अपनी सहमति जताई। तारीख को लेकर इनमें एक राय नहीं थी लेकिन ज्यादातर मुख्यमंत्री चाहते थे कि मानसून के बाद ही बजट पेश किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने इस कवायद के बाद ही रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एल०के० झा की अध्यक्षता में समिति बनाई थी, जिसने वित्त वर्ष एक जनवरी से शुरू करने का सुझाव दिया था।जानकारों का मानना है कि अब तक इस विषय पर सबसे गंभीर चिंतन ‘एलके झा समिति’ ने ही किया।अप्रैल 1985 में सौंपी रिपोर्ट में इसने वित्त वर्ष को जनवरी से शुरू करने की सिफारिश दी।

समिति के अध्यक्ष ने वित्त मंत्री के नाम अपने ‘नोट’ में कहा, ‘जनवरी से दिसंबर का वित्त वर्ष सबसे फायदेमंद है। इस बदलाव से बजट नवंबर में पेश होगा। तब तक खरीफ फसल का उत्पादन आकार और रबी फसल की संभावनाओं का पता चल चुका होगा। इसका फायदा अंतरराष्ट्रीय प्रचलन के अनुसार राष्ट्रीय खाते के लिए जरूरी आंकड़ों के संकलन में भी होगा.’

एल०के० झा समिति ने वित्त वर्ष में बदलाव के पक्ष में ये तर्क दिए – (क) मौजूदा वित्त वर्ष के चलते काम करने के सीजन का पूरा उपयोग नहीं हो पाता, (ख) अभी फसल अवधि और आंकडों की संकलन अवधि में अंतर है, (ग) बजट के पहले पेश होने से जन प्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र में काम करने में आसानी होगी, (घ) ज्यादातर देशों के वित्त वर्ष जनवरी से शुरू होते हैं, और (ड.) देश की संस्कृति और परंपराएं मौजूदा व्यवस्था के अनुकूल नहीं हैं।

सरकार ने इन सिफारिशों को मुख्यतः: तीन तर्क देते हुए लागू नहीं किया – (क) वित्त वर्ष बदलने से लाभ बहुत कम होंगे, (ख) आंकड़ों के संकलन में व्यवधान होगा और (ग) इसके लिए कर कानूनों और वित्तीय प्रक्रियायों में बदलाव जटिल होंगे।

किसानों की भलाई 

पक्ष

भारत एक कृषि प्रधान देश है। इस बात में सच्चाई जरूर है कि समग्र अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का हिस्सा धीरे-धीरे नीचे आ गया है।–  1950 के दशक में कृषि और कृषि संबंधित गतिविधियों का देश की पूरी अर्थव्यवस्था में 50% से भी अधिक योगदान था। पिछले कुछ वर्षों में देश की आर्थिक संरचना में बदलाव आया है। इन सब के कारण 2012-13 में कृषि और कृषि संबंधित क्षेत्र का हिस्सा 20% से भी कम हो गया। पर इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा की कृषि क्षेत्र का महत्व कम हो गया है। आज भी अधिकांश उत्तरी राज्यों के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 20% से अधिक है। उत्तर भारत के राज्य देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार आज भी देश की 68.84% जनता ग्रामीण इलाकों में रहती है। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय  की एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी 58 प्रतिशत जनता कृषि से जुड़ी है। 40% ग्रामीण परिवारों के लिए कृषि ही आय का मुख्य स्रोत है। आज भी देश की 48.9 प्रतिशत जनता रोजगार के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में कृषि को प्रभावित करने वाले मानसून का महत्व कहीं अधिक बढ़ जाता है।

भारत में व्यापक रुप से मानसून के दो मौसम है। जुलाई से सितंबर की अवधि में दक्षिण-पश्चिमी मानसून देश को प्राप्त होने वाली लगभग 75% वर्षा के लिए जिम्मेदार है। इसके अलावा अक्टूबर-दिसंबर की अवधि के दौरान पूर्वोत्तर मानसून के कारण दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों में विशेष रूप से तमिलनाडु राज्य में वर्षा होती है। मानसून की बारिश के समय के साथ जुड़ी हुई खरीफ (जुलाई से अक्टूबर की अवधि के दौरान फसल का मौसम) और रबी (अक्टूबर से मार्च तक फसल का मौसम) फसलों का उत्पादन होता है। दक्षिण-पश्चिमी मानसून सीधे तौर पर खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन को प्रभावित करता है। मिट्टी की नमी,जलाशयों, तालाबों एवं अन्य जल स्रोतों में जल की उपलब्धता को प्रभावित करने के कारण दक्षिण-पश्चिमी मानसून रबी फसलों के उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

आज भी देश की 56% कृषि वर्षा पर निर्भर है। पिछले कुछ सालों में सरकार ने मानसून पर कृषि की निर्भरता को कम करने के लिए अनेक प्रयास जैसे कि सिंचाई, आधुनिक तकनीक आदि क्षेत्रों में निवेश किया गया है। लेकिन आज की जो स्थिति है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में देश की मानसून पर निर्भरता जल्द खत्म होने वाली नहीं है। आज भी एक खराब मानसून वर्ष कृषि को बुरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे में खराब मानसून से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए यह जरूरी है की सरकार योजनाबद्ध तरीके से अपनी नीतियों को लागू करे। कृषि क्षेत्र का उत्पादन सीधे तौर पर मुद्रास्फीति को प्रभावित करता है, जिसका उपयोग भारतीय रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति को तैयार करने के लिए भी करता है। कम कृषि उत्पादन खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ावा देती है जिसके कारण ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है।ब्याज दरों में बढ़ोतरी निजी निवेश को प्रभावित करता है।कृषि की सफलता/असफलता में बजट महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

बजट की प्रक्रिया आमतौर पर सितंबर के महीने में शुरू होती है। इस समय वित्त मंत्रालय सभी मंत्रालयों/विभागों को प्राप्तियां,व्यय, राजस्व का मूल्यांकन, समय सारणी आदि बनाने के लिए सर्कुलर जारी करता है। जनवरी के अंत तक आमतौर पर राजस्व से संबंधित बजट के आकलन और व्यय को अंतिम रुप दिया जाता है। फरवरी का महीना बजट की अंतिम रूप रेखा तय करने और छपाई आदि कार्यों में निकल जाता है। इसके बाद फरवरी महीने की अंतिम तारीख को वित्त मंत्री संसद में बजट प्रस्तुत करते हैं। इसके बाद संसद में इस विषय पर चर्चा शुरु होती है और लगभग मई के पहले सप्ताह में विनियोग विधेयक और वित्त विधेयक आमतौर पर विधान मंडल द्वारा स्वीकृत कर दिया जाता है।

बजट कोई साधारण दस्तावेज नहीं है। यह सरकार के पास एक ऐसा उपकरण है जिसके माध्यम से वह दुर्लभ संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल करके समाज में सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय स्थापित कर सकती है। ऐसे में बजट बनाते वक्त यह जरूरी है कि सरकार के पास अर्थव्यवस्था संबंधी महत्वपूर्ण एवं सटीक जानकारी उपलब्ध हो ताकि सरकारी खजाने का  उचित ढंग से इस्तेमाल किया जा सके। मौजूदा व्यवस्था में कुछ खामियां है। फिलहाल की व्यवस्था में सरकार विभिन्न योजनाओं के लिए मई महीने में अगले वित्तीय वर्ष के लिए राशि तय करती है। चूंकि मानसून जून से शुरू होता है ऐसे में सरकार को मानसून के पूर्वानुमान के आधार पर बजट पेश करना पड़ता है। अगर किसी कारणवश मानसून ठीक नहीं रहता है तो समस्या उत्पन्न हो जाती है। यदि किसी साल सूखा पड़ा या बाढ़ आई तो उसके अनुकूल आवंटित राशि अगले साल बजट पेश होने के बाद जून तक ही आ पाती है। मानसून के बाद कई बार इलाकों के हालात भी बदल जाते हैं। जहां पिछले साल के सूखे से लड़ने के लिए धन आया था वहां इस बार बाढ़ आ जाती है, जहां बाढ़ राहत के लिए राशि भी भेजी गई वहां सूखा पड़ चुका होता है। ऐसे में किसानों को सही समय पर उचित सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती है। अगर बजट अक्टूबर या नवंबर में प्रस्तुत किया जाता है तो इससे आवंटित राशि जनवरी में ही मिल जाएगी। बजट राशि का आवंटन 5 माह पहले होने से देश मौसम की मार से कुशलता से लड़ पाएगा। इसके अलावा सरकार के पास रबी और खरीफ फसलों की पैदावर संबंधित सटीक जानकारी भी उपलब्ध होगी। इस प्रकार बजट बनाने की प्रक्रिया में सुधार हो पाएगा।

चूंकि मानसून अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है ऐसे में इसका असर सरकार के बजट पर भी देखने को मिलता है। खराब मानसून के कारण सरकार का टैक्स कलेक्शन प्रभावित होता है साथ ही विभिन्न इलाकों में सूखे आदि से राहत पहुंचाने के लिए सरकार को अतिरिक्त धन खर्च करने की भी जरूरत पड़ती है। निश्चित तौर पर अगर बजट मानसून को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है तो इससे विशेषकर ग्रामीण जनसंख्या को लाभ पहुंचेगा और बजट उनके अनुकूल बनाया जा सकेगा। दिलचस्प बात यह है कि जब भी वित्तीय वर्ष की तारीखों को बदलने की मांग ने जोर पकड़ा है उसके एक या दो साल पहले खराब मानसून या सूखे से देश का सामना हुआ था। एल०के झा की कमेटी के गठन से पहले देश में 1979-80 और 1982-83 में सूखा पड़ा था।  शंकर आचार्य कमेटी भी 2014 ई० और 2015 ई० में खराब मानसून के बाद गठित की गई है।

प्रतिपक्ष

वित्त वर्ष को कृषि से जोड़ने का तर्क मूल रूप से राजनीतिक ही रहा है, अर्थशास्त्रियों यहां तक कि कृषि अर्थशास्त्रियों ने कभी इसका समर्थन नहीं किया। यह तर्क भी अकसर सुनाई देता रहा है कि वित्त वर्ष और सालाना बजट जैसी अवधारणाएं मूल रूप से उस अर्थशास्त्र से निकली हैं जो औद्योगिक क्रांति की देन है, और यह अर्थशास्त्र किसान की दृष्टि से नहीं सोचेगा। वह जब भी कृषि के बारे में सोचेगा, कृषि को एक कारोबार की तरह ही देखेगा। 80 के दशक के बाद वित्त वर्ष बदलने की इस तरह की मांग खत्म हो गई। किसान राजनीति न्यूनतम समर्थन मूल्य और कर्ज माफी जैसी मांगों तक सीमित हो गई और कैलेंडर बदलने की मांग करने वाले विचारकों को भी शायद इसकी व्यर्थता का अहसास हो गया।

बजट को अक्टूबर या नवंबर में पेश करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि उस समय तक खरीफ की फसल तैयार हो चुकी होती है और इस बात का पूरा आकलन हो चुका होता है कि मानसून कैसा रहा?कहां सूखा पड़ा और कहा बाढ़ आई? हालांकि इसके जवाब में यह भी कहा जाता था कि एक अप्रैल को जब देश का वित्त वर्ष शुरू होता है तो रबी की फसल पककर तैयार हो चुकी होती है जो देश की प्रमुख फसलों में से एक है, इसलिए एक तरह से वित्त वर्ष पहले ही कृषि से जुड़ा हुआ है।

यह ठीक है कि किसानों को राहत देने के उद्देश्य से वित्तीय वर्ष में बदलाव करने की बात हो रही है, किंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा करने से हम  यह भी स्वीकार कर लेते हैं कि भारत की कृषि आज भी मानसून यानि भगवान भरोसे ही है। यह विकासवादी सोच नहीं है। भारतीय कृषि की बेहतरी के लिए हमें आधारभूत संरचना में बदलाव करना होगा, इसके लिए बड़े प्रयासों की आवश्यकता है। बजट की तारीखें बदलने से कृषि को कोई चमत्कारिक लाभ नहीं होगा।

अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य

पक्ष

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी देश में वित्तीय वर्ष की तारीख निर्धारित करने के लिए कोई तय मानक नहीं है। सभी देश अपनी सहूलियत के अनुसार वित्तीय वर्ष की तारीख तय करते हैं। आमतौर पर सभी सरकारें किसी तिमाही की पहली तारीख अर्थात, 1 अक्टूबर, 1 जनवरी, 1 अप्रैल, और 1 जुलाई से अपने वित्त वर्ष की शुरुआत करते हैं। दुनियाभर के 100 से भी ज्यादा देश, जैसे कि ब्राजील, कंबोडिया, क्यूबा, फ्रांस आदि कैलेंडर वर्ष (जनवरी-दिसंबर) को ही वित्त वर्ष के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। भौगोलिक तौर पर ज्यादातर यूरोपीय, एशियाई और दक्षिण अमेरिकी देश इस प्रणाली का उपयोग करते हैं।

भारत, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, जापान में  1 अप्रैल से 31 मार्च तक का वित्तीय वर्ष होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में वित्त वर्ष की अवधि 1 अक्टूबर से 30 सितम्बर तक है। आस्ट्रेलिया, मिस्र, पाकिस्तान में 1 जुलाई से 30 जून तक के 12 महीने वित्त वर्ष होते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक, आईएमएफ एवं विश्व के बड़े वित्तीय संस्थाओं ने कैलेंडर वर्ष को ही अपने वित्त वर्ष के रूप में अपना रखा है।

इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैलेंडर वर्ष ही बजट, वित्तीय रिपोर्टिंग एवं अन्य आर्थिक कार्यों के लिए सबसे स्वीकृत एवं पसंदीदा विकल्प है।

फार्च्यून 500 की सूची में शीर्ष 50 अमेरिकी कंपनियों का एक संक्षिप्त विश्लेषण इस ओर इंगित करता है कि ज्यादातर कंपनियां अपने वित्तीय वर्ष के रूप में कैलेंडर वर्ष का ही उपयोग करते हैं।

उन देशों में जहां व्यवसायों को वित्तीय वर्ष चुनने की आजादी है, वहां कुछ व्यावसायिक संस्थाएं मौसमी चक्रों को भी ध्यान में रखकर अपना वित्तीय वर्ष तय करते हैं, उदाहरण स्वरूप कुछ रिटेल आधारित संस्थाओं को जनवरी-दिसंबर उपयुक्त जान पड़ता है तो वहीं कृषि केंद्रीय संस्थाओं अपने-अपने वित्त वर्ष के रूप में कृषि फसल के मौसम के अनुसार अपना वित्तीय वर्ष तय करते हैं।

अगर हम अंतर्राष्ट्रीय तौर पर प्रचलित वित्तीय वर्ष को अपनाते हैं तो इससे हमें विदेशी कंपनियों के साथ व्यापार करने में आसानी होगी। साथ ही साथ हम दुनिया के साथ और बेहतर ढंग से तालमेल बना सकेंगे। इससे विदेशी कंपनियों के लिए हमारे देश में निवेश करना  आसान भी हो जाएगा।

प्रतिपक्ष

वित्तीय वर्ष को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दलील में भी कोई दम नहीं है क्योंकि इस संबंध में कोई मानक वैश्विक व्यवहार है ही नहीं। इस बदलाव से भारत में निवेश बढऩे की भी कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि यह निवेश में गतिरोध की मुख्य वजह नहीं है। इतना ही नहीं इस कदम की बदौलत देश के आर्थिक आंकड़ों को लेकर पहले से ही धूमिल माहौल और अधिक अस्पष्ट होगा।

आंकड़े जुटाने की समस्या

पक्ष

वित्तीय वर्ष में बदलाव करने से आंकड़े जुटाने में कोई खास विघ्न उत्पन्न नहीं होगा। आज भी अलग-अलग आंकड़े जुटाने के लिए भिन्न- भिन्न समयावधि का उपयोग किया जा रहा है।

35 महत्वपूर्ण बुनियादी सांख्यिकी श्रृंखलाओं में से लगभग 11 कैलेंडर वर्ष पर संकलित किए जाते हैं और 22 वित्तीय वर्ष पर आधारित हैं। कृषि संबंधित आंकड़ों के लिए कृषि वर्ष (जुलाई-जून) का उपयोग किया जाता है। आज भी त्रैमासिक जीडीपी अनुमान तथा वार्षिक जीडीपी अनुमान से सामंजस्य बिठाने के लिए कृषि उत्पादन को प्रोराटा आधार पर समायोजित किया जाता है ।सीएसओ के अनुसार आंकड़े जुटाने के लिए अलग-अलग अवधि होने से कोई खास समस्या नहीं है। सीएसओ को अर्थव्यवस्था संबंधी तमाम आंकड़े और जानकारियां अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को भी देनी पड़ती है। इन संगठनों में कैलेंडर वर्ष को प्राथमिकता दी जाती  है। यानी देश का वित्तीय वर्ष अगर 1 जनवरी से शुरू हो तो आंकड़ों के संग्रह और प्रस्तुतीकरण का राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय तालमेल सीएसओ आसानी से बिठा सकेगा ।

प्रतिपक्ष

सभी प्रमुख आर्थिक संस्थानों को भी अपना अपने कैलेन्डर में बदलाव करना होगा। यह केवल एक बजट का मामला नहीं है, इस बदलाव के लिए पूरी अर्थव्यवस्था में ऐसे संस्थागत बदलाव लाने होंगे जिनकी लागत बहुत ज्यादा होगी। अगर देश के विभिन्न राज्य अलग-अलग वित्तीय वर्ष का इस्तेमाल करेंगे तो इससे आंकड़े जुटाने में और अधिक समस्या होगी।

कामकाजी सत्र

पक्ष

भारत में कामकाजी सत्र अक्टूबर से जून-जुलाई तक का होता है। बजटीय आवंटन मार्च के अंत में खत्म हो जाता है और इसके बाद नए आवंटन के लिए मई तक इंतजार करना पड़ता है। लेकिन साथ ही साथ जून की शुरुआत से मानसून शुरू हो जाता है जिसके कारण विकास और निर्माण कार्यों में विघ्न उत्पन्न होता है। इस प्रकार हम अपनी पहली दो तिमाहियों का सर्वोत्तम इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं ।

प्रतिपक्ष

अगर हम सरकारी योजनाओं पर हुए माहवार खर्चों का आकलन करें तो यह पता चलता है कि सरकार सितंबर महीने के अंत तक तय राशि का लगभग 50 फ़ीसदी हिस्सा खर्च कर देती है। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना कि मौजूदा बजट की अवधि के कारण पहली दो तिमाहियों में ठीक प्रकार से काम नहीं हो पाता है उचित नहीं होगा। इसके अलावा सरकार ने साल के अंत में होने वाले अतिरिक्त व्यय करने की प्रथा को कमजोर करने के लिए भी अपने तंत्र में कई सुधार किए हैं। यह सच है कि मानसून के कारण कुछ निर्माण कार्यों में समस्या उत्पन्न होती है, पर आज के समय में हमारी अर्थव्यवस्था में काफी विविधता आ गई है। मानसून का हमारे विकास कार्यों पर उतना असर नहीं पड़ता जितना बताया जा रहा है।

जन-प्रतिनिधियों की सहूलियत

पक्ष

एक वक्त कई सांसदों विधायकों ने यह महसूस किया कि बजट सत्र की अवधि (फरवरी-मई) व्यवहारिक नहीं है। वर्तमान व्यवस्था में सांसदों या विधायकों को बरसात के मौसम में ही अपने निर्वाचन क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों का जायजा लेने का वक्त मिल पाता है।बारिश के मौसम  में अपने क्षेत्र में भ्रमण करना असुविधाजनक हो जाता है, ऐसे में अगर बजट की तारीखों में बदलाव किया जाता है तो यह समस्या दूर हो सकती है।

प्रतिपक्ष

हो सकता है बीते समय में जून-जुलाई के मौसम में सांसदों को अपने क्षेत्र का दौरा करने में परेशानी होती होगी, पर आज जब परिवहन और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व तरक्की हो चुकी है, इस तर्क का कोई महत्व नहीं रह जाता। ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिसके कारण सभी मौसमों में कार्य करना संभव है। आज जनप्रतिनिधियों को अपने सहूलियत के लिए वित्तीय वर्ष में बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है।

भारतीय परंपरा

पक्ष

अंग्रेजों ने अपनी सहूलियत के अनुसार भारत का वित्तीय वर्ष तय कर दिया। ऐसा करते समय भारत की अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का ख्याल नहीं रखा गया। भारतवर्ष विविधताओं भरा देश है जहां विभिन्न धर्म एवं संस्कृतियों के लोग आत्मीयता से रहते हैं। अगर भारत में ‘नया साल’ को वित्तीय वर्ष चुनने का सिद्धांत माना जाए तो फाल्गुन पूर्णिमा(फरवरी/मार्च) या चैत्र(मार्च/अप्रैल) शुक्ल पक्ष के पहले दिन को वित्त वर्ष घोषित किया जा सकता है। चूँकि भारत एक युवा देश है, ऐसे में कैलेंडर वर्ष युवाओं की पसंद के अनुरूप होगा। अगर पैदावार के महीनों के आधार पर वित्तीय वर्ष की तारीखें तय की जातीं हैं तो 21/22 दिसंबर, ओणम, पोंगल या मकर संक्रांति को भी वित्तीय वर्ष की शुरुआत का आधार माना जा सकता है। क्योंकि दीपावली पारंपरिक तौर पर भारत में वित्तीय वर्ष की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है, ऐसे में दीपावली के आस-पास की कोई तिथी भी वित्तीय वर्ष की शुरुआत के लिए उपयुक्त होगी।सिर्फ परंपरा के आधार पर वित्तीय वर्ष की तारीखों में बदलाव करना बचकाना होगा,पर अगर कोई बदलाव होता है तो इसमें हमारी अपनी परम्पराओं की झलक होनी चाहिये।

प्रतिपक्ष

एक अप्रैल की तारीख होली से शुरू होने वाले उस चैत महीने से बहुत दूर नहीं है जब सांस्कृतिक रूप से भारत के एक बड़े हिस्से का नया वर्ष शुरू होता है। बंगाल में नया साल पोइला बैसाख को शुरू होता है जो 13, 14 या 15 अप्रैल को पड़ता है। महाराष्ट्र में मार्च-अप्रैल में गुड़ी पड़वा मनाया जाता है। पंजाब में 13/14 अप्रैल को बैसाखी पड़ती है,तारीख भले न तय हो लेकिन एक अप्रैल से शुरू होने वाला बजट भी भारतीय परंपरा के काफी करीब है

इस तारीख को हमेशा ब्रिटिश परंपरा के चश्मे से ही क्यों देखा जाता रहा है?

इस कदम से ऐसे वक्त में व्यापक उठा पटक पैदा होगी जबकि देश के वित्तीय तंत्र को  स्थिरता की आवश्यकता है। देश पहले ही विमुद्रीकरण और जीएसटी के कारण हुए बदलावों से जूझ रहा है।

इस मुद्दे पर एसोचैम(एसोसिएटेड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ऑफ इंडिया) ने भी अपनी राय रखी है। इसमें कहा गया है, ‘देश के वित्तीय वर्ष को अप्रैल-मार्च के बजाय किसी और समय में करने से कोई मकसद हल नहीं होगा। इससे बड़े पैमाने पर सिर्फ बाधाएं ही खड़ी होंगी, जिनसे बचा जा सकता है। इन बाधाओं से अगर नहीं बचा गया तो इसका खामियाजा देश के व्यापार और उद्योग को भुगतना होगा।’

क्या बदलाव करने होंगे?

जैसा कि हम जानते हैं, अनुच्छेद-367 (1) में वित्तीय वर्ष से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या के लिए जनरल क्लॉज एक्ट-1897 का संदर्भ दिया गया है। मतलब इस जगह पर सरकार को वित्तीय वर्ष बदलने की सूरत में अनिवार्य रूप से संविधान संशोधन करना होगा।                                                     केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व-संसाधनों के बंटवारे आदि से संबंधित 14वें वित्त आयोग की सिफारिशें एक अप्रैल 2015 से पांच साल (2020 तक) के लिए लागू हो चुकी हैं। वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तमाम प्रावधान और सिफारिशें करते हुए वित्तीय वर्ष की शुरुआत एक अप्रैल से होने का जिक्र किया है, जो कि अब तक स्थापित व्यवस्था भी है। ऐसे में केंद्र सरकार अगर 2020 से पहले वित्तीय वर्ष में किसी भी किस्म के बदलाव का फैसला करती है तो उसे वित्त आयोग से संबंधित इस बाधा को भी पार करना होगा। यही नहीं, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों से संबंधित तमाम कानूनों में केंद्र और राज्यों को संशोधन करना होगा। गवर्नमेंट अकाउंटिंग रूल्स-1990, जनरल फायनेंशियल रूल्स-2005 और कंपनीज एक्ट-2013 आदि में भी संशोधन करना होगा। इन सभी में वित्तीय वर्ष की शुरूआत एक अप्रैल से होने का जिक्र है।

वित्तीय वर्ष बदलने से पहले सरकार को अवस्था परिवर्तन वाले वित्तीय वर्ष (ट्रांजीशनल फायनेंशियल इयर) की परिभाषा और अवधि तय करनी होगी। उदाहरण के लिए वित्तीय वर्ष बदले जाने की तारीख अगर जनवरी 2018 तय की जाती है तो अप्रैल से दिसंबर 2017 तक पूरा काल खंड ट्रांजीशनल फायनेंशियल इयर माना जा सकता है। अवस्था परिवर्तन की अवधि सरकार को ही परिभाषित करनी है। सरकार बदलाव में लगने वाले समय के अनुसार इसकी परिभाषा कम या ज्यादा कर सकती है।

इस संबंध में अमेरिका का उदाहरण मौजूद है। 1974 में अमेरिकी संसद ने एक कानून पारित किया जिसका नाम था, ‘द कांग्रेसनल बजट एंड इम्पाउंडमेंट कंट्रोल एक्ट-1974.’ इसमें प्रावधान किया गया था कि अमेरिकी वित्तीय वर्ष अब जुलाई से जून के बजाय अक्टूबर से सितंबर के बीच होगा। बदलाव दो साल बाद यानी 1976 से होना था। लिहाजा, वहां की संसद ने एक जुलाई से 30 सितंबर 1976 के बीच की अवधि को ट्रांजीशनल फायनेंशियल इयर माना था।

मौजूदा सरकार बदलाव के नारे के साथ सत्ता पर काबिज हुई थी। सरकार के कुछ निर्णयों से यह पता भी चलता है कि यह पारंपरिक तरीकों को बदलने में संकोच नहीं करती। हालांकि बिना सोच विचार कर किये गए बदलाव के कारण कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। नोटबंदी का उदाहरण हम लोगों के समक्ष है। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार आनन-फानन में कोई निर्णय ना ले। शंकर आचार्य कमेटी की रिपोर्ट को जल्द से जल्द सार्वजनिक किया जाना चाहिए और इस पर खुलकर बहस होनी चाहिए। एक अच्छे बदलाव के लिए कोई भी समय उपयुक्त होता है, लेकिन हड़बड़ी में गड़बड़ी की आशंका भी बनी रहती है। आने वाले वक्त में वित्तीय वर्ष की अवधि में कोई परिवर्तन होता है या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा!

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