आसानी की दुश्वारी

द्वारा सत्यम कुमार 

यह विज्ञापन 10 मार्च को ‘द हिन्दू’ अखबार में प्रकाशित हुआ था।वैसे तो यह एक आम विज्ञापन ही है,जिसमें सरकार अपने द्वारा किये गए प्रगतिशील कार्यों का उल्लेख कर रही है और मीडिया के माध्यम से इसे जनता तक पहुँचाने का प्रयास कर रही है।

इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें तो इसमें दो-तीन गौर करने योग्य बातें हैं:-

1) लाल और बड़े अक्षरों में लिखा गया ‘Ease of Doing Business: Construction Permits’

2) बोल्ड अक्षरों में लिखा गया ‘Delhi’ और ‘Mumbai’

 इसके बाद ‘निर्माण के लिए परमिट’ हासिल करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए उठाये गए कदमों का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है तथा इससे संबंधित किसी भी प्रकार की शिकायत करने के लिए हेल्पलाइन आदि।

जिन पाठकों को विश्व बैंक द्वारा जारी की जाने वाली ‘ इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ रैंकिंग तथा इस रैंकिंग में भारत की स्थिति के बारे में जानकारी है, वे इस विज्ञापन के उद्देश्य को अब तक भली-भाँति समझ गए होंगे।

यह  इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस  रैंकिंग है क्या? इसे मापने का पैमाना क्या है? इस रैंकिंग में भारत की स्थिति क्या है? इस सुचिकाँक की खूबियाँ और खामियाँ क्या हैं? क्या हमें सच में ऐसी किसी भी रैंकिंग को गंभीरता से लेना चाहिए? भारत सरकार ने इस रैंकिंग को प्रतिष्ठा का सवाल क्यों बना लिया है और इस रैंकिंग में सुधार के लिए क्या-क्या कदम उठाये जा रहे हैं?

यह लेख इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास करता है।

विश्व बैंक वर्ष 2003 से हर वर्ष ‘डूइंग बिज़नेस’ रिपोर्ट प्रकाशित कर रहा है जिसमें ‘ इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के आधार पर विभिन्न देशों को आँका जाता है और एक रैंकिंग दी जाती है।उच्च रैंकिंग व्यवसायों के लिए बेहतर और सरल नियम तथा संपत्ति एवं अधिकारों की मज़बूत सुरक्षा का संकेत देते हैं।विभिन्न शोधों से यह बात स्पष्ट तौर पर साबित होती है कि व्यावसायिक नियमों के सुधार और सरलीकरण का आर्थिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट की मूल शुरुआत वर्ष 2002 में ‘क्वार्टरली जर्नल ऑफ़ इकोनॉमिक्स’ में प्रकाशित एक शोधपत्र से हुई जिसका शीर्षक था- ‘द रेगुलेशन ऑफ़ एंट्री (The regulation of entry)’.इसमें 85 देशों में किसी भी स्टार्टअप के प्रवेश में लगने वाली आधिकारिक लागत,समय,प्रक्रियाओं की संख्या आदि की जानकारी थी।इस शोधपत्र से यह निष्कर्ष निकाला गया कि जिन देशों में नए कारोबार की शुरुआत करने के रास्ते में ज्यादा नियम हैं,वहां उतना ही अधिक भ्रष्टाचार है।लोकतान्त्रिक और उदारवादी देशों में नियम आसान और सरल हैं।इस शोधपत्र से यह साफ़ हो गया कि जटिल नियमों से सिर्फ राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों का भला होता है और निजी क्षेत्र की कंपनियों को नुकसान।

यह रैंकिंग इन 10 मापदंडों पर आधारित है—व्यापार शुरू करना, निर्माण परमिट हासिल करना, बिजली प्राप्त करना, संपत्ति का पंजीकरण, ऋण प्राप्त करना, अल्पांश निवेशकों का संरक्षण, कर का भुगतान, सीमा पार कारोबार, अनुबंधों को लागू करना तथा दिवालियेपन का निपटारा।

विश्व बैंक इस रैंकिंग को जारी करने के लिए ‘डिस्टेंस टू फ्रंटियर’ अर्थात सर्वोत्तम स्थिति से दूरी को मापता है। यह एक तुलनात्मक अध्ययन है। उदाहरण स्वरुप, न्यूजीलैंड में एक नए कारोबार की शुरुआत करने के लिए सिर्फ एक प्रक्रिया है, जो  विश्व में सबसे कम है। इसे ही सर्वोत्तम स्थिति का दर्जा दिया जाता है और इससे अन्य देशों की तुलना की जाती है। इस आधार पर सभी अर्थव्यवस्थाओं के प्रदर्शन को 0 से 100 के पैमाने पर इंगित किया जाता है।0 सबसे खराब तो वहीं 100 सर्वोत्तम स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। आमतौर पर इस रैंकिंग को निकालने के लिए किसी भी देश के सबसे बड़े व्यवसायिक शहर में सर्वेक्षण किया जाता है, उदाहरण स्वरुप यूके की रैंकिंग के लिए लंदन, न्यूज़ीलैंड के लिए ऑकलैंड, ऑस्ट्रेलिया के लिए सिडनी शहर में इस वर्ष सर्वेक्षण किया गया। यही इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है। सिर्फ एक शहर में व्यापारिक स्थिति के आधार पर पूरे देश को मापना कहां तक उचित है? इस आलोचना के कारण पिछले कुछ वर्षों से विश्व बैंक ने ना सिर्फ सबसे बड़े व्यवसायिक शहर बल्कि दूसरे सबसे बड़े व्यवसायिक शहर में भी यह सर्वेक्षण शुरू किया है। अभी यह व्यवस्था सिर्फ कुछ देशों तक सीमित है ।भारत उनमें से एक है ।इस वर्ष की रिपोर्ट दिल्ली और मुंबई में किए गए सर्वेक्षणों पर आधारित है ।इसी प्रकार बांग्लादेश ,चीन ,पाकिस्तान जैसे कुल 11 देशों में भी 2 शहरों में सर्वेक्षण किया जाता है । इन देशों का स्कोर दोनों शहरों के जनसंख्या भारित औसत के आधार पर निकाला जाता है। भारत के संदर्भ में मुंबई का भार 47 प्रतिशत वहीँ  दिल्ली का भार 53 प्रतिशत है।

इस वर्ष के सर्वेक्षण में 190 देशों ने भाग लिया। विश्व बैंक की डूइंग बिजनेस 2017 की सूची में न्यूजीलैंड पहले स्थान पर जबकि सिंगापुर दूसरे स्थान पर है। इसके बाद क्रमशः डेनमार्क, हॉन्गकॉन्ग, दक्षिण कोरिया, नॉर्वे, ब्रिटेन, अमेरिका तथा स्वीडन का स्थान है ।व्यापार करने की दृष्टि से भारत 130वें स्थान पर है। वर्ष 2015 में भारत का स्थान 131 था। रैंकिंग में भारत के मुकाबले रूस, चीन, नेपाल आदि की स्थिति कहीं बेहतर है। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया के 137 अर्थव्यवस्थाओं ने प्रमुख सुधारों को अपनाया जिससे छोटे और मंझोले आकार की कंपनियों को शुरू करना और उनका परिचालन आसान हुआ है। व्यवसाय की शुरुआत करने में भारत का स्थान 155वां है, निर्माण के लिए परमिट लेने में 185वां स्थान है। इस पिछड़ी रैंकिंग से यह बात समझी जा सकती है कि सरकार निर्माण संबंधी परमिट हासिल करने की प्रक्रिया को सरल बनाने में क्यों लगी है। बिजली के मामले में भारत का स्थान 26वां है ,जो कि काबिले तारीफ है ,क्योंकि गत वर्ष भारत 51वें स्थान पर था। संपत्ति के पंजीकरण के मामले में भारत 138वें स्थान पर है, ऋण प्राप्त करने में भारत का स्थान 44वां है। इनके अलावा अल्पांश निवेशकों का संरक्षण, कर का भुगतान, सीमा पार कारोबार, अनुबंधों को लागू कराने और दिवालियापन के निपटारे में भारत का स्थान क्रमशः 13वां ,172वां ,143वां, 172वां और 136वां है। इस वर्ष  इन 10  मापदंडों  में से  भारत ने  4 में  अपनी रैंकिंग  सुधारी है ,पर इसमें  सिर्फ बिजली प्राप्त करने  में ही  उल्लेखनीय सुधार हुआ है।कर अदायगी में  भारत की स्थिति यथावत  बनी रही।  इसके अलावा बाकी 5 मापदंडों पर  भारत की रैंकिंग  मे हल्की सी गिरावट दर्ज की गई। सुधारों को आगे बढ़ाने के आधार पर 10 प्रमुख देश- ब्रुनेई , दारुसलाम, केन्या, बेलारूस, इंडोनेशिया, सर्बिया,जॉर्जिया, पाकिस्तान ,संयुक्त अरब अमीरात तथा बहरीन हैं। भारत की रैंकिंग में नाममात्र सुधार की एक बड़ी वजह अन्य देशों का और भी बेहतरीन प्रदर्शन माना जा रहा है।

वर्ष 2009 में विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘डूइंग बिजनेस इन इंडिया’ में भारत के 17 शहरों में सर्वेक्षण कर व्यवसायिक नियमों पर जानकारी एकत्रित की गई थी। यह रिपोर्ट स्थानीय नियमों पर केंद्रित है जो एक छोटे और मध्यम आकार के बिजनेस को प्रभावित करने वाले नियमों की पड़ताल करती है। यह रिपोर्ट सात मापदंडो पर आधारित है- कारोबार शुरू करना, निर्माण परमिट हासिल करना, संपत्ति दर्ज कराना, करो का भुगतान, सीमा पार व्यापार ,अनुबंधों को लागू करना और व्यवसाय बंद करना। यह भारत को समर्पित पहली सबनेशनल रिपोर्ट है। इसमें पाया गया कि राजकीय, शहरी और राष्ट्रीय नियमों में सुधार करने से स्थानीय व्यवसायिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार लुधियाना, हैदराबाद, भुवनेश्वर में कारोबार करना आसान था वहीं कोच्चि और कोलकाता में एक व्यवसाय शुरू और संचालित करना अधिक मुश्किल था।

रैंकिंग भी एक मायाजाल है। विभिन्न वैश्विक संस्थाएं अलग-अलग रैंकिंग प्रकाशित करती हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 138 देशों को लेकर ग्लोबल प्रतिस्पर्धा रिपोर्ट तैयार करता है।इसके अनुसार पिछले वर्ष भारत ने 16 पायदान की छलांग लगाई और 55 वें  स्थान से 39वें स्थान पर आ पहुंचा। उसी प्रकार विश्व बौद्धिक संपत्ति संगठन ‘ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स’ जारी करता है। इसके अनुसार भारत 66वें स्थान पर है। इसी प्रकार व्यवसाय संबंधी और भी अनेक रैंकिंग प्रतिवर्ष जारी की जाती हैं। सभी संस्थाओं के मापदंड अलग-अलग हैं और रैंकिंग निकालने की प्रक्रिया भी अलग है। ऐसे में हमें किस रिपोर्ट को गंभीरता से लेना चाहिए और किसे नहीं यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है। साल के अंत में पान बहार से लेकर लक्स अंडरवियर और बनियान जैसे ब्रांड अनगिनत फिल्म पुरस्कार समारोह आयोजित करते हैं।एक अभिनेता जिसे किसी एक समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिलता है उसी को दूसरे ब्रांड के समारोह में  नामांकन तक नहीं मिलता। जितनी भी नई पुस्तकें बाजार में आती हैं, सभी किसी ना किसी सूची में बेस्ट सेलर होने का दावा करती हैं । जब सूचियां ज्यादा हों, तो किसी एक को सर्वोपरि मानकर अपना सारा ध्यान उसकी तरफ केंद्रित कर देना कहां तक उचित है?

यह रैंकिंग सिर्फ मुंबई और दिल्ली के आंकड़ों पर आधारित है ।यह सबसे अधिक परेशान करने वाली बात है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर रांची, नासिक जयपुर, कानपुर आदि किसी भी शहर में कोई सुधार होता है, तो उनका इस रैंकिंग के गणित पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विश्व बैंक अपनी इस कमी को स्वतः स्वीकार करता है और इसके पीछे यह तर्क देता है कि ऐसा करने से सर्वेक्षण करने में आसानी होती है तथा धन और समय की बचत। सिर्फ मुंबई और दिल्ली को अपने सर्वेक्षण में शामिल करने के कारण और भी कई समस्याएं उत्पन्न होती है । जैसा की हम जानते हैं कि पिछले 40- 50 वर्षों में इन दोनों महानगरों की जनसंख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। ऐसे में सरकार की कोशिश यही रही है कि इन दोनों शहरों में भीड़ कम की जाए और कल-कारखानों तथा उद्योग-धंधों को शहर से दूर ले जाया जाए। इसके अलावा यह भी देखा गया है कि आमतौर पर जो नए व्यवसाय इन शहरों में चालू होते हैं वह किसी किराए के ऑफिस या मकान में चालू किए जाते हैं, ऐसे में निर्माण संबंधी परमिट हासिल करने के मापदंड का बहुत अधिक महत्व नहीं रह जाता। कई जानकारों का यह भी कहना है कि अगर हम सिर्फ महानगरों के आधार पर किसी देश को आंकें तो इससे श्रेणी-दो और श्रेणी-तीन शहरों की वास्तविकता का पता नहीं लगता।आमतौर पर बड़े शहरों में सुविधाएं हैं ज्यादा होती है।छोटे शहरों में  लालफीताशाही  और अफसरशाही  का बोलबाला होता है।  फाइलें एक टेबल से दूसरे टेबल  पर भटकती रहती हैं ।सरकारी दफ्तरों  में भ्रष्टाचार  की कहानियां  आम  बात हैं।  आज  रफी साहब  जिंदा होते  तो जो बातें  उन्होंने कभी  प्यार के लिए कही थी  वही बात  आज भ्रष्टाचार के लिए कह रहे होते -‘ जो ख़त्म हो किसी जगह  ये ऐसा सिलसिला नहीं’! इस देश में इज ऑफ डूइंग बिजनेस सच्चे मायनों में उस दिन आएगा जिस दिन एक छोटे शहर का छोटा व्यापारी भी आसानी से अपना कारोबार स्थापित कर पाएगा। जो रिपोर्ट इस सच को नहीं दिखा सकती उसे कितना महत्व दिया जा सकता है?

 इस रैंकिंग की प्रणाली में और भी कई खामियां हैं जो कि भारत की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं। इस सर्वेक्षण में सिर्फ संगठित क्षेत्र की कंपनियों से जानकारी इकट्ठा की जाती है, ऐसे में हमारे देश के असंगठित क्षेत्र को प्रभावित करने वाले नियमों की अनदेखी हो जाती है। इस सर्वेक्षण में जानकारी इकट्ठा करने के लिए विश्व बैंक सिर्फ विशेषज्ञों की राय लेता है, इसका अर्थ यह हुआ इसमें किसी छोटे-मोटे कारोबारी के निजी अनुभव की कोई झलक नहीं मिलती। इसके अलावा इस प्रणाली के मापदंडों पर भी सवाल उठते हैं। उदाहरणस्वरूप, इंफ्रास्ट्रक्चर का सिर्फ एक पैमाना इस रैंकिंग में है- बिजली प्राप्त करना, इसका मतलब अगर सड़क, रेलवे आदि क्षेत्रों में कोई सुधार होता है तो  उसका कोई प्रभाव इस रैंकिंग पर नहीं पड़ेगा।

इस रैंकिंग में भले ही कई खामियां हो पर इसके माध्यम से विभिन्न अर्थव्यवस्थाएं विश्व में चल रही सर्वोत्तम प्रक्रियाओं से परिचित होती हैं ।इस रिपोर्ट की ख्याति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसमें दिए गए आंकड़ों का उपयोग आर्थिक और व्यवसायिक जगत में कार्यरत शोधकर्ताओं द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाता है। विगत कुछ वर्षों में कई देशों ने इस रिपोर्ट में वर्णित आर्थिक सुधारों को अपने यहां लागू किया है, जिससे वहां व्यापार करना सुगम हो गया है 190 देशों में आंकड़े जुटाना और उन्हें एक साथ प्रकाशित करना एक कठिन कार्य है।जब एक ही प्रक्रिया अलग-अलग देशों (जो एक दूसरे से कई मायनों में अलग हो सकते हैं) पर अपनाई जाती है तो उसमें कुछ खामियां होना स्वभाविक है, पर एक केंद्रीय कार्यप्रणाली होने से सभी देशों का तुलनात्मक अध्ययन करना आसान हो जाता है। इस रिपोर्ट को पढ़ते वक्त हमें इसकी सीमाओं को जान लेना चाहिए, इससे इस रिपोर्ट की महत्ता कम नहीं होती।

 जैसा कि हम देख चुके हैं कि विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित रैंकिंग की अपनी कमजोरियां हैं ,ऐसे में इसे जरूरत से ज्यादा तवज्जो देना ठीक नहीं है। दरअसल समस्या की शुरुआत तब हुई जब 2015 की रिपोर्ट में भारत ने 12 स्थानों की छलांग लगाई थी। सरकार ने उसे अपने कार्यों की सफलता का सर्टिफिकेट मान लिया और इसे बहुप्रचारित किया। सरकार ने इसी उत्साह में यह घोषणा भी कर दी कि अगले कुछ वर्षों में भारत इज़ ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में विश्व के 50 टॉप देशों में शामिल हो जाएगा। जरूरत से ज्यादा उत्साह हानिकारक होता है, विश्वास ना हो तो अरविंद केजरीवाल से पूछ लीजिए! इस वर्ष जबकि सरकार इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि भारत फिर से अपनी रैंकिंग को सुधारेगा, विश्व बैंक की रिपोर्ट सरकार के लिए निराशा लेकर आई। भारत की स्थिति सुधरी तो, पर सिर्फ एक पायदान। सरकार के अनुसार रिपोर्ट में सरकार द्वारा लागू किए जाने वाले प्रमुख सुधारों पर विचार नहीं किया गया। भारत के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग के अनुसार लगभग दर्जनभर महत्वपूर्ण सुधार सरकार ने किए हैं जिन में दिवाला संहिता, जीएसटी, इमारत योजना की मंजूरी के लिए एकल खिड़की प्रणाली, ऑनलाइन कर्मचारी राज्य बीमा आयोग और भविष्य निधि  पंजीकरण जैसे सुधार शामिल है। इन सभी पर विश्व बैंक ने इस साल विचार नहीं किया।

एक तर्क जो बार-बार दिया जा रहा है वह यह कि  किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन की रिपोर्ट में अच्छी रैंकिंग से वैश्विक स्तर पर देश की छवि सुधरेगी और विदेशी निवेश बढ़ेगा। यह तर्क पहली नजर में तो ठीक लगता है, पर कोई निष्कर्ष निकालने से पहले हमें चीन की स्थिति को देख लेना चाहिए। इज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में चीन 78वें स्थान पर है। यह स्थिति भारत से तो कहीं बेहतर है पर बहुत अच्छी भी नहीं है। इसके अलावा ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक में भी चीन काफी पीछे है। इस सूची में चीन भारत के साथ 79 वें स्थान पर है। ऐसे में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किसी सूची में आगे होना विदेशी निवेश की गारंटी नहीं है। कल अगर हम जोड़-तोड़ करके इस सूची में चीन से आगे निकल भी जाते हैं तो क्या यह मान लिया जाएगा कि कारोबार अथवा विदेशी निवेश के मामले में भारत ने चीन को पछाड़ दिया है? आज देश को संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है। यह बदलाव दो या तीन सालों में हो जाना मुश्किल है। हमारी पुरानी घिसी-पिटी व्यवस्था के ढांचे को बदलने में समय लगेगा। भारत सरकार इस दिशा में निरंतर काम कर रही है, किसी रैंकिंग में प्रगति हो या ना हो इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता। भारत सरकार को संयम के साथ इस दिशा में काम करते रहना चाहिए।

भारत सरकार ने अगले वर्ष जारी होने वाली रिपोर्ट में भारत की स्थिति को सुधारने के लिए युद्ध स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। अगर हम भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय और औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग की वेबसाइट पर जाएं तो कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। इस वेबसाइट पर सरकार ने कारोबारियों का फीडबैक जानने के लिए एक फॉर्म अपलोड किया है। इसका मकसद यह है की अगली रैंकिंग जारी होने के पहले सरकार अपनी कमियों को जान ले और उस दिशा में सुधार किए जा सकें ।इसके अलावा इस वेबसाइट पर भारत में ‘व्यवसाय करने की आसानी’ में सुधार लाने हेतु बड़ी पहलों की लिस्ट भी दी गई है। इनमें से कुछ सुधार नीचे दिए गए हैं:-

1)दिल्ली में वैट पंजीकरण को ऑनलाइन कर दिया गया है। टिन का आवंटन तुरंत किया जाता है, टिन संख्या मिलते ही व्यवसाय तुरंत शुरू किया जा सकता है ।

2)एसईजेड इकाइयों को स्वयं-साक्ष्यांकन पर मरम्मत, प्रतिस्थापन, परीक्षण, कैलिब्रेशन, गुणतापरीक्षण ,अनुसंधान एवं विकास हेतु माल हटाने की अनुमति है।

3) कंपनियों के लिए न्यूनतम प्रदत्त पूंजी तथा सामान्य सील की अपेक्षाओं को हटाने के लिए कंपनी संशोधन अधिनियम, 2015 पारित किया गया है। इसमें अनेक अन्य विनियामक अपेक्षाओं को भी सरल बनाया गया है।

4) व्यवसाय के समग्र कार्यकाल के दौरान निवेशकों का मार्गदर्शन, सहायता तथा सहयोग करने के लिए ‘इन्वेस्ट इंडिया’ में एक निवेशक सुविधा केंद्र का गठन किया गया है।

5)श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा एलआईएन हेतु इकाइयों के पंजीकरण,निरक्षण की रिपोर्ट विवरणियां प्रस्तुत करने तथा शिकायत निवारण के वास्ते एक एकीकृत पोर्टल की शुरुआत की गई है।

भारत सरकार राज्य सरकारों को भी इज ऑफ डूइंग बिजनेस की दिशा में कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करने में लगी है। इसके लिए विश्व बैंक की मदद से 340 बिंदुओं का एक्शन प्लान तैयार किया गया है, और राज्यों को इन्हें लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रहे इसके लिए इन सुधारों को लागू करने के पैमाने पर बाकायदा एक रैंकिंग भी जारी की जा रही है। ताजातरीन रैंकिंग के अनुसार आंध्र प्रदेश और तेलंगाना 98.78 प्रतिशत के स्कोर के साथ अव्वल नंबर पर हैं। इसके बाद गुजरात, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का नंबर आता है। आए दिन ऐसे रैंकिंग्स को मीडिया में जगह मिलती रहती है। ऐसे में उम्मीद यही की जा रही है कि बाकी राज्य भी जल्दी ही इन सुधारों को अपनाएंगे।

आज के समय में इज ऑफ डूइंग बिजनेस एक चर्चित विषय है, और जिस प्रकार सरकार ने इसे अपने प्राथमिक लक्ष्यों की सूची में डाल दिया है, उससे यही लगता है कि आने वाले समय में भी इस रैंकिंग के इर्द-गिर्द गतिविधियां थमने का नाम नहीं लेंगी। इस रिपोर्ट की चर्चा का एक पैमाना यह भी है इस बार के BPSC( बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन) की परीक्षा में इज ऑफ डूइंग बिजनेस से संबंधित एक प्रश्न भी आया था, हो सकता है UPSC (यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन) में भी आ जाए! इस विषय के बारे में पढ़ते रहिए और अगली डूइंग बिजनेस रिपोर्ट का इंतजार कीजिए।

References:-

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